Tuesday, 5 May 2026

मजबूरियां


सफेद शर्ट और नीली पैंट पहनकर तैयार होकर ख़ुद को आईने में देखा तो सुर्ख आंखे रात की बेचैनी बयां कर रही थी। मैंने अपनी हाथ की घड़ी तलाश की और कलाई पर बंधी और बाल बनाये, मैंने वक़्त देखा अभी मुलाक़ात के होने में 45 मिनट थे। मैं इस बार पहले पहुँचना चाहता था, अब तक वक़्त को लेकर लापरवाह हुआ करता था और किसी से भी मिलने पर, ज़रा देर से पहुँचने को शान समझता था। पर एक ख़ास इंसान ने मुझ में तबदीली ला दी, कम से कम उस के साथ मिलने पर मुझे वक़्त की पावंदी का ख़्याल रखना ज़रूरी था, बस फिर क्या था अपनी बाइक की चाबी उठाई और घर से निकल गया, उस ख़ास से मिलने को।

बाइक चलते वक़्त दिमाग ना जाने कितने उलझनों में फॅसा था और दिल की धडकने आने वाले पलों को सोचकर बेचैन कर रहीं थी। मुझे अंदाज़ा ही नहीं था के जब सामना होगा हम में से कौन, कैसे मिलेगा? वक़्त और हालात अलग होंगे तो क्या जज़्बात भी अलग होंगे?

मैं भारी ट्रैफिक के बीच से अपने बाइक निकलता हुआ, दिल--जंग के साथ उस कैफे के सामने पहुंच गया था जहाँ आज मुलाक़ात होनी थी।

मैंने पार्किंग में अपने बाइक लगाई और हेलमेट उतारकर बाइक के शीशे में देखकर अपने बाल सही किये,  फिर कैफे में अंदर की तरफ चल दिया। सुबहः का वक़्त था, कैफे अभी खुला ही था और पूरी तरह ख़ाली था। मैंने चारो तरफ नज़र दौड़ाई और एक टेबल की तरफ बढ़ गया। कुर्सी पर सही से बैठकर मैं अपने बड़ी धडकनों को गहरी साँसे लेते हुए काबू करने लगा। कलाई घुमा के वक़्त देखा दस बजे थे, मुझे अहसास हुआ कोई करीब खड़ा हुआ है, मैंने सिर उठा के देखा तो चौक गया जूही अपने वही जानी पहचानी मुस्कराहट के साथ सामने खड़ी थी। सफेद रंग की शर्ट और पैंट, बाल कंधे तक और सादगी से तैयार हुई सामने खड़ी थी, मेरी धड़कन जैसे रुक-सी गयी।

'हेलो!’ मैं सकपकाते हुए बोला, उसको यूँ अचानक सामने खड़ा देखकर चौंक गया और उठने की कोशिश करने लगा।

'हेलो' उसने जवाब दिया और मुझे बैठे रहने का इशारा करते हुए सामने की कुर्सी खींचकर बैठ गयी।

वो मुस्कुराते हुए मुझे सपाट निगाहों से देख रही थी और मैं बहुत ही नर्वस-सा महसूस कर रहा था और समझ नहीं आ रहा था के क्या बोलू और इधर-उधर देखने लगा।

'वो पता ही नहीं चला, तुम कब कैफे में अंदर आयीं…,' मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा।

'तुम ठीक हो ना?' उसने हौले से पूछा और अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा के मेरे हाथ अपने हाथों में ले लिए।

उसके देखने के अंदाज़ से मैं अंदर तक सिहर गया और हाथ-पैर ठन्डे पड़ गये। समझ नहीं आ रहा था ऐसे कैसे हो सकता है, मैं तो हमेशा से बहुत ही कॉंफिडेंट हुआ करता था, अंदर से इतना कमज़ोर-सा कैसे महसूस हो रहा था।

वो धीरे-धीरे मेरे हाथ सहलाने लगी और बोली -

'सब सही? ' उसकी आवाज़ और अंदाज़ मुझे और अंदर से हिला रहा था।

'हाँ, बेहतर हूँ', मैंने आस-पास निगाह दौड़ते हुए जवाब दिया।

'पहली बार थोड़ी मिल रहे हैं, इतना परेशान क्यों लग रहे हो फिर?' उसने मेरे आँखों में देखते हुए मालूम किया।

'इतने अरसे बाद मिल रहे हैं फिर तुम वापिस चली' मैं आधी बात कहकर रुक गया।

'क्या मेरे पास इसके अलावा कोई और रास्ता है?' उसने मेरे आँखों में आंखे डाल कर पूछा।

'वो' मेरी आवाज़ मेरे गले में अटक के रह गयी, मैं लाजवाब होकर नीचे की तरफ देखने लगा।

मैंने देखा वो एकटक मेरी ऊगली में पहनी हुई अंगूठी को देख रही थी, ना चेहरे पर कोई जज़्बात, ना मुँह में कोई अल्फ़ाज़, बस उसकी पथराई-सी आंखे मेरी अंगूठी पर रुक गयी थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था के क्या कहु, क्या करू, बस धीरे से अपने हाथ उसके हाथो से छुड़ा लिए और उसकी तरफ देखने की कोशिश करने लगा।

'कुछ कहना है तो, कह सकती हो' मैंने सवाल किया ताकि हमारे बीच की ख़ामोशी को तोड़ सकू। मैं उसके ज़हन में चल रहे सवाल जानना चाहता था।

'नहीं, मेरी पास कुछ भी नहीं है कहने को!' उसने एक खोकली हसीं हसते हुए कहा।

उसके अंदाज़ से मैं और परेशां-सा हो गया। 

'यु ही जाने से पहले, एक मुलाक़ात को बुलाया था, फिर शायद ही वापिस आना हो' उसने कहा।

'कब जा रही हो जर्मनी? मेरी शादी में आओगी ना?' मैंने 2 सवाल एक साथ पूछे, जिनका जवाब शायद मुझे मालूम भी था।

'शादी में ना आना पड़े, इसलिए ही तो जा रही हु!' वो तपाक से बोली और ठहाका लगा के फिर हॅसने लगी।

आज उसकी बाते और अंदाज़ मेरी समझ से बाहर था, किस बात पर मैं क्या कहु, समझ नहीं आ रहा था।

'एक दोस्त होने के नाते, नहीं आओगी मेरी शादी में?' मैंने सवाल किया।

'क्या हम दोस्त थे?' उसने मेरी सवाल के जवाब में दूसरा सवाल कर दिया।

मैं सर झुका के नीचे की तरफ देखने लगा।

'मेरा इंतज़ार करते' वो मेरी अंगूठी की तरफ फिर से देखने लगी।

'वो मेरी घरवाले वो' मैं कुछ कहने ही वाला था तो वो बोल पड़ी।

 'बस कुछ ना कहोशायद ये रिश्ता एक-तरफा ही था। वैटररररररर!' वो अपने बात कहकर ज़ोर से रिसेप्शन की तरफ मुँह करके चिल्लाई।  

मैं कुछ बोल पता तभी वेटर सामने खड़ा था।

'ब्लैक कॉफ़ी विथ अवाकाडो सैंडविच मेरे लिए और सर के लिए वैनिला लट्टे और फ्रेंच टोस्ट विथ बेर्री टॉपिंग। क्यों सही ना या टेस्ट चेंज हो गया है अब?' उसने मेरे तरफ नज़र डाल कर तन्ज़िया अंदाज़ में मालूम किया।

'ये ही पसंद है अभी भी!' मैंने धीरे सी कहा।  

'प्लीज ब्रिंग ईट सून!' उसने वेटर को जाने का इशारा करते हुए कहा।

'जूही! ई ऍम सॉरी' मैंने उसको देखकर कहा।

'सॉरी फॉर व्हाट?' वो बनावटी हैरत से बोली।

'तुम मुझ सी नाराज़ हो ना?' मैंने कहा।

'इट्स ओके बाबा, सब को अपने ज़िन्दगी के फैसले करने का हक़ है, जिसको जो बेहतर लगे। ऐसा तो कुछ नहीं हुआ के मैं नाराज़ हो जाऊ' उसने लापरवाही से जवाब दिया।

इस ज़िद्दी-सी लड़की सी कैसे बात की जाये जो ख़फ़ा भी है और ज़ाहिर भी नहीं कर रही, मैं सोचने लगा।

'यहाँ का इंटीरियर काफी अच्छा है, बिलकुल नया और दिलचस्प…' मैंने बात आगे बढ़ते हुए कहा।

'हाँ, नयी चीज़ कई बार दिलचस्प ही लगती है' उसने जवाब दिया।

'जूही, तुम सिर्फ एक साल की ट्रेनिंग करने गयीं थी जर्मनी, उसके बाद तो कंपनी में ही ज्वाइन करना था। ये वापिस जाने का प्लान कब और क्यों बनाया?' मैंने गहरी सांस लेते हुए, संजीदगी मालूम किया।

'इरादा तो ये ही था पर आकर हालात बदले हुए लगे तो वापिस जाना ही सही लगा…' उसने मुस्कुराते हुए कहा।

उसकी मुस्कराहट और अंदाज़ की तल्ख़ी अंदर तक चीर देने वाली थी। वेटर ने आकर आर्डर सर्वे किया और हम दोनों नाश्ता करने लगे, एक ख़ामोशी की दिवार से हम दोनों के बीच में खींच गयी, समझ नहीं आ रहा था के क्या बात की जाये।

कॉफ़ी का सिप लेते हुए मैंने जूही को देखा वो बाहर की तरफ देख रही थी। उसका रवैया मेरी समझ से बाहर था। जूही और मैं 2 साल से एक दूसरे को जानते थे उसकी सादगी और बिंदास नेचर मुझे बेहद पसंद था। पहले हम दोनों में दोस्ती हुई और फिर प्यार। सारे ऑफिस को हमारे अफेयर का पता था। इस दौरान जूही का ऑफिस की तरफ से जर्मनी ट्रेनिंग जाने का हुआ और वो दोनों की रज़ामंदी से चली भी गयी।

जब भी वक़्त मिलता हम लोग बातचीत किया करते थे, कोई वादे तो नहीं किये थे पर दोनों को अहसास था के जूही के वापिस आने के बाद ये रिश्ता और मज़बूत हो जायेगा। इस दौरान मेरी घर में मेरी शादी की बातचीत होने लगी, घरवालों को एक बिसनेस क्लास परिवार से इंजीनियर लड़की पसंद आ गयी, नौकरी पैकेज और देखने में सब बढ़िया थी। उनके कहने पर मैं भी उसे देखने चला गया और मेरी 'सब सही है' सुनते हे झटपट शादी तय कर दी गयी, मैं चाहकर भी जूही का ज़िक्र नहीं कर पाया। मुझे लगा सब इतने खुश है हर बात उनकी मर्ज़ी की है, तो मैं कैसे अपनी पसंद की लड़की की बात उनसे करू। और आनन-फानन में हमारी मंगनी हुई, ऑफिस में मिठाई बाटी और सब की बधाईयाँ मिलने लगीं।

कुछ दिन बाद ही जूही अपने जर्मनी की ट्रेनिंग करके वापिस ऑफिस आ गयी और उसको ऑफिस के लोगो ने सब मालूम हुआ। मुझे लगा एक बार मिल के सब बताऊंगा। पर जूही ने ही कांटेक्ट करके एक संडे के दिन कॉफ़ी पर बुला लिया और वो मेरी सामने बैठी थी। मुझे लगा था के बहुत नाराज़ होगी और शिकायत करेगी और मैं अपनी मजबूरियां बताऊंगा, पर उसके ठन्डे बर्ताव से और हैरत हुई।

'क्या सोच रहे हो?' उसने मुस्कुराते हुआ पूछा।

'जूही, जर्मनी वापिस जाकर क्या बातचीत करोगी, ई मीन क्या टच में रहोगी?' मैंने मालूम किया।

'नहीं! वैटररररररर बिल प्लीज़!' उसने मेरे बात का जवाब दिया और लापरवाही से वेटर को आवाज़ लगाई।

मैं बहुत कुछ कहना सुनना चाहता था, मुझे उसके गिले, शिकवे, शिकायते सुननी थी और अपनी बेबसी और मजबूरियां और दुनियादारी समझनी थी पर जूही को तो जैसे ना कुछ कहना था, ना सुनना था।

वेटर बिल जैसे ही लेकर आया उसने फ़ौरन पर्स खोलकर  एक उस में पैसे उसे दे दिए।

'कीप चेंज' और जाने को खड़ी हो गयी।

'जूही…?' मैंने नज़र उठाके उसको कुछ कहना चाहा।

'तुमने जिसको भी शादी के लिए चुना है यकीनन बेहतर होगी, तुम्हे तुम्हारी आगे की ज़िन्दगी और शादी के लिए मुबारकबाद, बस आखिरी बार तुम्हे देखने की खुआईश की वजह से बुलाया था, मेरी बात रखने के लिए शुक्रिया, बाय' आखिरी अल्फ़ाज़ कहते हुए उसके आँखों में पानी दो मोती से चमके और वो तेज़ी से बाहर निकल गयी।

और मैं ठगा वही बैठा रह गया।