ऑफिस से घर पहुँचते-पहुँचते हमेशा की तरह सात बज गये। मैंने शावर लिया और चाय बना ही रहा था, के मोबाइल बजने लगा, करीब से देखा तो लिखा आ रहा था, 'अब्बा'। मैंने गहरी साँस ली और चाय बनाने में लग गया, इतनी थकान के बाद मैं अब्बा के मसले, चाय के बाद ही सुनना चाहता था। एक-एक करके तीन बार कॉल आये और फिर बंद हो गये, मैं चाय का उबाल देखने को वही खड़ा रहा और उबाल आने पर, मग में चाय छानकर सोफे की तरफ बढ़ गया।
मैं बहुत थकान महसूस कर रहा था, काम से ज़्यादा
मैं अपने हालात से थका हुआ था। फ़रमाबरदार बेटा होना आसान
नहीं होता, कई बार उसकी बड़ी कीमत अदा करने होती है। कई बार औलाद सिर्फ
एक औलाद नहीं होती बल्कि वो एकलौता शक़्स होती है, जिसको अपने घर
की उम्मीदें, इज़्ज़त, आना, ग़ुरूर सब का बोझ
अपने कंधे पर ढोना होता है। चाय का मग धीरे-धीरे ख़ाली हो रहा था और मैं ताज़ादम हुआ
और लगा के अब मैं अब्बा से बात कर सकता हूँ।
मैंने चाय का मग एक तरफ रखा और मोबाइल उठा के अब्बा को कॉल
लगाने लगा।
'सलाम अब्बा!' मैंने उनके कॉल
उठाते ही कहा।
'वालेकुम सलाम मेरे बच्चे! कैसे हो तुम और कब आये ऑफिस से?' अब्बा ने जवाब
दिया।
'ठीक हूँ अब्बा, आप बतायेँ के
अम्मी कैसे हैं और मेरा बेटा आफ़ताब कैसा है?' मैंने सब की ख़ैर-ख़बर जाननी चाही।
'वो… मैं… क्या कहु समझ नहीं आता…' वो कुछ कहते कहते
रुक गये।
'अब्बा, अब क्या हुआ बतायें भी…' मैं कुछ झल्ला-सा गया।
'बेटा… वो आज… छोटी बहु का कहना
ना मानने पर उसने आफ़ताब को सीडी से धक्का दे दिया, उसके सिर में 4 टक्के आये हैं और बुख़ार भी है। मैंने और अम्मी ने उसे बहुत
सुनाया, पर ये सब कब तक चल सकता है?' उन्होंने गहरी सांस
ली।
'क्या?' मेरे मुँह से
हैरत से इतना ही निकल पाया।
'ठीक हो जायेगा आफ़ताब, तुम परेशान मत होना बेटा…' अब्बा ने फ़िज़ूल
की तसल्ली देने की कोशिश की।
'भाभी ने ऐसा क्यों किया अब्बा, उन्हें उस बिन माँ के बच्चे पर तरस नहीं आया? क्या मेरी बात हो सकती है, अभी आफ़ताब से?' मैंने बेचैन होकर पूछा।
'अभी सोया है वो… तुमसे ये कहना है
के- छोटी बहु का रवैया गलत है आफ़ताब के साथ। हमसे अब नहीं
संभाला जा रहा कुछ… तुम आओ और अपना
बेटा लेकर जाओ, उसे अपने साथ रखो… चाहे अकेले पालो या दूसरे शादी करो, पर अपने साथ रखो!' अब्बा ने नरम
लहज़े में कहा।
'अब्बा! मुझे और पढ़ना था… आपने कहा बाहर जाओ नौकरी करो, घर की ज़िम्मेदारियाँ उठाओ… नौकरी शुरू की तो जैसे ही पहली दफा घर आया… आपने अपने दोस्त को ज़ुबान दे थी और मेरे मना करने के
बावजूद उसकी की बेटी से मेरी शादी करवा दी, कहा- तुम नौकरी करो तुम्हारी बीवी यहाँ हमारे
साथ रहेगी। ना चाहते हुए भी
मैंने शादी की और अपने बीवी वहीँ छोड़ के यहाँ आ गया और वहां मेरा बेटा पैदा हुआ और मेरी बीवी से जाने क्या घरेलु
मसले शुरू हो गये के दो साल बाद जब दोबारा गया, तो आपने कहा
उसको तलाक दे दू… अब्बा मैंने बहुत मना किया आपको… मेरा साल भर का बेटा था… आपने एक ना सुनी
और अपने वालिद होने का वास्ता देकर तलाक दिलवा दी… बेटा भी ये कहकर
अपने पास रख लिया- हम पाल लेंगे। अब्बा अब कहते हो के आपसे नहीं हो पा रहा, मैं उसको ले जाऊ? अब्बा, आपकी औलाद पर आपने कभी रहम नहीं किया… अब्बा अब मुझसे भी नहीं हो पा रहा… मैं भी थक गया, अब्बा। मैं बहुत
थक गया …' मेरा गला रुंध गया और मैं फुट-फुट के रोने लगा।
जिसने कभी अपने अब्बा को पलट कर जवाब तक नहीं दिया था, आज वो ग़म से फट पड़ा था और बेबसी में रो रहा था।
दूसरी तरफ सन्नाटा बिखर गया।
'हाँ, कहीं ना कहीं हमने
जल्दबाज़ी हुई है, तुम्हारा घर बसाने और तोड़ने में, पर अब इस बच्चे की ज़िन्दगी के लिए आख़िरी बार हमारी बात और
मान लो और इसे ले जाओ और अपने साथ रखो!' अब्बा की आवाज़
भारी हो गयी थी और उनकी आवाज़ में अहसास-ए-जुर्म महसूस किया जा सकता था। मुझे अम्मी
की सिसकियाँ भी पीछे से सुनाई दे रहीं थी।
'अच्छा अब्बा, मैं देखता हुआ
ऑफिस में बात करके, कैसे क्या हो
सकता है, फिर ही आपको बता पाऊंगा के कब आना होगा, तब तक मेरे बेटे
का ख़याल रखयेगा, अम्मी को सलाम और आफ़ताब को प्यार, अल्लाह-हाफ़िज़!' मैंने ये कह के कॉल रख दिया।
मैं धीरे से सोफ़े से उतरकर से ज़मीन पर बैठ गया।
No comments:
Post a Comment