Sunday, 9 August 2026

सफ़र


बस में अभी चढ़ा ही था, के नज़र दौड़ाई कुल 2-4 सवारी ही थी, मैं एक ख़ाली सीट देखकर बैठ गया।

'अभी टाइम क्या हुआ होगा?' तभी कंडक्टर ने मालूम किया।

'5:45' बस की पिछली सीट से एक दिलकश-सी आवाज़ में जवाब आया।

'5:3' हुए हैं अभी, इन मोहतरमा के घड़ी नेपाल का टाइम बता रही है, मैंने अपनी जगह से हॅसते हुए कहा।

पीछे की सीट से किसी ने गुस्से से झाँक कर देखा, गुलाबी सूट में दुबली-सी एक लड़की जिसके चेहरे पर 2 लटे उसको और भी दिलचस्प बना रही थी।

'मैडम, अपनी घड़ी का टाइम मेरी से सेट कर लीजिये, परफेक्ट हो जायेगा' मैंने और मज़े लेते हुए, उसे चिढ़ाने के इरादे से कहा।

'भैया, इनकी घडी का टाइम परफेक्ट है, इन्हे पर्मनंट बस में ही रख लीजिये, आपको बस चलवाने में आसानी रखेगी' उसने मेरी की तरफ देखते हुए कंडक्टर से कहा।

'ओह हो!' मुझे वो अजनबी लड़की, उसकी हाज़िर-जवाबी, उसका तीखा अंदाज़ और उसकी आवाज़ दिलचस्प लगी।

उस दिन वो किस बस स्टॉप पर उतरी और कहाँ से थी और कहाँ जा रही थी? मुझे कुछ पता नहीं चला पर रात को उसके बारे में सोचता रहा और सोचते हुए सो गया। 

एक दिन ऑफिस से वापसी के वक़्त बस में चढ़ा, इधर-उधर नज़र दौड़ाई एक सीट ख़ाली देखी और बैठ गया। साइड की सीट की तरफ नज़र गयी तो देखा वही गुलाबी सूट वाली लड़की बैठी थी और इस दफ़ा उसने हलके नीले रंग की कुर्ती और जीन्स पहनी हुई थी, वो किसी किताब में इस कदर डूबी हुई थी जैसे के उसको दुनिया की ख़बर ही नहीं थी के क्या हो रहा है। 

बस चल पड़ी पर वो अभी भी लापरवाही से किताब पढ़ने में लगी थी, मुझे अब बेचैनी से होने लगी के कैसे अपने मौजूदगी दर्ज करवाऊ।

मैंने उसकी तरफ झुककर किताब का नाम ज़ोर से पढ़ा आर्म्स एंड डा मैन”, अरे ये तो जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का नावेल है, इसमें एन्ड में रैनाहीरो सेर्गिअस से शादी को मना कर देती है' मैंने बहुत संजीदगी से कहा।

उसने हैरत से किताब से सर उठाकर मुझे देखा। 

'ओह तुम!' उसने हैरत और गुस्से से कहा।

'जी, आप इतने देर से पढ़ रही थी, मैंने सोचा देखू ऐसे कौन-सी बुक है और ये तो मेरी पढ़ी हुई निकली' मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

उसने बुरा-सा मुँह बना के किताब अपने बैग में रख दी।

'वैसे ये आपका शौक है किसी किताब का सस्पेंस ख़राब कर देना या आज कोई ख़ास बात है?' उसने अपने बड़ी-बड़ी आँखों से घूरते हुए पूछा।

'बसवो यू ही!' मैं समझ गया आज मेरी ख़ैर नहीं। 

'हेलो, साहिल नाम है मेरा और आपका? ' मैंने मुस्कुरा के माहोल हल्का करने को कहा।

'ओके!' उसने लापरवाही से कहा और विंडो से बाहर देखने लगी।

मैं ख़ामोश होकर इधर-उधर देखने लगा, आज के वक़्त में कोई मोबाइल ना देखकर किताब पढ़े या विंडो से बाहर चलती बस से नज़ारा ले, ये हैरत वाली बात है। अभी 15 मिनट गुज़रे ही थे, के वो अपने सीट से उठ गयी।

'एक्सक्यूज़ मीस्टॉप आने वाला है, साइड दीजिये साहिल जी!' उसने कहा।

'ना, पहले अपना नाम बताओ…' मैंने कहा और कुछ पलों के बाद उसको साइड दे दी, ताकि वो अपने स्टॉप पर उतर सके।

'नीलू' उसने हौले से कहा और बस रुकने पर उतरकर चली गयी।

मुझे ऐसा लगा जैसे कोई जंग जीत ली हो।

ऑफिस से वापिस आते वक़्त वो बस की दूसरे सीट पर किताब पढ़ती हुई मिलती और साइड में बैग रखा होता, जिसको मै हटाकर बैठ जाता, मुझे मालूम था वो मेरे बैठने के लिए वो सीट घेर के रखने लगी थी। सफ़र के दौरान वो किताब पढ़ती रहती और बीच-बीच में अपनी बातचीत हुआ करती। किताब, पॉलिटिक्स और म्यूजिक उसका फेवरेट टॉपिक हुआ करते। जाने कब ये ऑफिस से वापसी के सफ़र के 15 मिनट इतने दिलचस्प हो गये के पता ही नहीं चला। मुझे दिन भर इस सफ़र का इंतज़ार रहता और रात को इस मुलाक़ात को सोचते हुए सो जाता।

पढाई के बाद ये मेरे नयी नौकरी थी और घर से दूर अकेले और नीरस काम करने पर उकताहट-सी होने लगी थी। अब ज़िन्दगी और ये वापसी का सफ़र कुछ दिलचस्प हो गया था।

नीलू ने बताया के वो बी. कॉम. के फाइनल ईयर में है और उसके एग्जाम होने वाले थे, कुछ ही दिनों में उसका आना बंद हो गया। मैंने उसके टच में रहने को उसका मोबाइल नंबर मांगा तो उसने कहा के मोबाइल माँ के पास रहता है इसलिए वो नंबर नहीं दे सकती। ये बात मुझे बहुत ही अटपटी सी लगी के आज के ज़माने में कोई बिना मोबाइल के ऐसे रहता हो, फिर लगा शायद बहाना कर रही हो और मोबाइल नंबर नहीं बताना चाहती हो।

3-4 महीने से ज़्यादा हो गये थे और उसका कोई आता-पता नहीं था, फिर भी निगाहें उसको तलाश करती रहती, फिर ऐसे ही आदत हो गयी। एक दिन बस में चढ़ा तो देखकर हैरान रह गया के वो अपनी वही सेकंड सीट पर बैठी हुई थी और उसको कई पट्टियां बंधी हुई थी और दर्द में लग रही थी।

'अरे क्या हुआ तुम्हें नीलू?' मैंने उसके साइड में बैठते हुए मालूम किया।

वो मैं रोड के किनारे बस के इंतज़ार में खड़ी थी, किसी ने बाइक से टक्कर मार दी और ये चोट लग गयी' उसने करहाते हुए कहा।

उसकी पट्टियो से खून रीस रहा था और उसकी कुर्ती फटी हुई थी जहाँ से उसका जिस्म दिख रहा, जिसे वो ढकने की वो बार-बार कोशिश कर रही थी।

मुझे याद आया के ऑफिस का ए.सी. में ठंडा लगने की वजह से मैं अपने बैग मैं हमेशा एक हलकी-सी जैकेट रखता हु, मैंने फ़ौरन अपना लैपटॉप का बैग खोलकर, वो जैकेट निकल ली, ताकि उसको पहनने को दे सकूँ।

 'नहीं रहने दीजिये, मेरा स्टॉप आने ही वाला होगा' उसने हिचकते हुए कहा।

'पहनो इसे, इस तरह कैसे जाओगी घर तक' मैंने जैकेट पकड़कर, उसको उसको पहना दी।

'शुक्रिया' उसने नीचे देखते हुए कहा।

10 मिनट में उसका स्टॉप आ गया था पर वो अपने सीट से उठ भी नहीं पा रही थी, मैंने सोच लिया के इसको इसके घर तक पॅहुचा देता हु, उसके मना करने के बावजूद मैंने उसको उठने और उतरने में मदत की और उसके स्टॉप पर उतर गया।

'यहाँ से कितने दूर है घर?' मैंने मालूम किया।

'मैं चली जाती, आप फ़िज़ूल परेशान हुएयहाँ से 5 मिनट की वाक है' धीरे से कहा।

'ठीक है कोई बात नहीं, मैं तुम्हें घर तक पहुचा के, कैब से चला जाऊंगा वो आहिस्ता ही चल पा रही थी मैं उसे पकड़कर चलने में मदत कर रहा था।

मेरा फ्लैट, बुल्डिंग में तीसरी मंज़िल पर है और सीढ़ियों से जाना होता है' उसने हिचकते हुए बताया।

'कोई बात नहीं, मैं तुम्हें वहां तक पहुचाये बग़ैर नहीं जाने वाला, समझी! मैंने हक़ से कहा।

किसी तरह उसकी बिल्डिंग के नीचे तक पहुंचे और बुल्डिंग की सीढ़ियां देखकर समझ आ गया के नीलू का इन पर चढ़ पाना बहुत ही मुश्किल है, किसी तरह सीढ़ियां चढ़ते हुए उसके फ्लैट के दरवाज़े तक पहुंचे।  

'डोर बैल नहीं बजानामेरे बैग में चाबियाँ हैं घर की…’ उसने अपने बैग पर इशारा करते हुए कहा।

मैंने उसके घर की चाबियाँ उसके बैग से निकाली और दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही एक छोटा सा बदहाल कमरा दिखा, झिरी से टूटी कुर्सी और दिवार पर टेड़ा लटका हुआ, कैलेंडर नज़र रहा था।

'कौन नीलू?' अंदर से किसी बुज़ुर्ग महिला की आवाज़ आयी।

'अच्छा में चलता हु' मैं वापिस जाने लगा।  

'रुको, पानी पीकर जाना' उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

'मुझे देर हो रही है, फिर कभी' मैंने धीरे से उसके हाथ से अपना हाथ अलग किया और मैंने अपने पॉकेट से अपना विजिटिंग कार्ड निकलकर उसकी पहनी हुई जैकेट की जेब में रख दिया।

'कुछ हेल्प चाहे हो तो कभी भी कॉल कर सकती होमैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा और नीचे उतरकर, अपने मोबाइल से कैब बुक करके घर की तरफ निकल गया।

नीलू एक सदा-सी लड़की थी पर उसके घर के हालात का मुझे अंदाज़ा नहीं था, जाने क्यों अजीब से मन से वापिस आया।

मुझे उम्मीद थी के नीलू मेरे कार्ड वाले नंबर पर कॉल करेगी और कम से कम मुझे शुक्रिया अदा करेगी या जैकेट वापिस करने के लिए कहेगी।

कई दिन गुज़र गये, उसका कोई कॉल नहीं आया और हर गुज़रते दिन के साथ उम्मीद टूटी गयी, मैंने ख़ुद को समझा लिया के मैंने मदत इंसानियत के नाते की थी और उसमें और कोई उम्मीद करना गलत है।

मेरा ट्रेनिंग का वक़्त पूरा हो गया था और अब मेरी पोस्टिंग दिल्ली में हो रही थी, जाने से पहले कई बार दिल हुआ के कम से कम एक बार नीलू से ज़रूर मिलू पर इस ख़याल से मैंने ख़ुद को समझा लिया के जिस लड़की ने शुक्रिया तक बोलने को कॉल नहीं किया, जब के उसके पास मेरा विजिटिंग कार्ड और उस पर लिखा एड्रेस और मोबाइल नंबर था, उसको इस क़दर सोचना सही नहीं ।

मैंने दिल चाहने के बावजूद ऐसे ही चले जाना सही समझा। दिल्ली मे परिवार के पास आ गया था और साल भर होने को हो गया था, वक़्त के साथ नये ऑफिस में एडजस्ट हो गया था। मम्मी को अब घर के छोटे बेटे की शादी की फ़िक्र हो गयी और वो तरह-तरह से मालूम करने लगीं थी के कहीं कोई लड़की पसंद हो तो बता दू और अपनी पसंद की लड़कियो के फोटो दिखाने लगी थी।

एक संडे शाम को मम्मी के साथ किसी लड़की को देखने के लिए बेमन से हम्मी भर दी। मैं दोपहर मे बैठा अपने लैपटॉप में मेल देख रहा था के मेरा मोबाइल बजा मैंने अजनबी नंबर देखकर कट कर दिया, पर दोबारा कॉल आया तो उठा लिया।

'हेलो' मैंने कहा।

'हेलो, इस दिस साहिल?' उधर इस कुछ जानी-पहचानी-सी आवाज़ आयी।

'जी, कौन?' मैंने मालूम किया।

'मैं नीलू!' दूसरी तरफ से आवाज़ सुनकर चौक गया, समझ ही नहीं आया के कैसे रियेक्ट करू। इतने लम्बे वक़्त के बाद सुध लेने का क्या मतलब? इतने समय से ख़ामोश रहने की क्या वज़ह? और अगर कोई तलूक रखना ही नहीं था तो अब कॉल क्यों? मुझ मैं हैरत भी थी, गुस्सा भी और वज़ह जानने की ख्वाईश भी।

'हाँ नीलू, कहो कैसे याद किया?' ना चाहते हुए भी मेरी आवाज़ में तल्खी थी।

कॉल की दूसरी तरफ ख़ामोशी थी और अब मैं उसके लिए फिकरमंद महसूस कर रहा था।

'कहाँ हो तुम और कैसी हो, कुछ बताओगी?' मैंने बेचैनी से मालूम किया।

'साहिल, तुम कहाँ हो? मैंने कई बार बस में तुम्हे तलाश किया तुम नहीं मिले?' उसने धीरे से कहा।

'फिलहाल मैं दिल्ली मैं पोस्टेड हु। तुम्हारे पास मेरे ऑफिस का पता था, मोबाइल नंबर था, तुम जब चाहे मुझे कॉल कर सकती थी, तुमने तो मुझे कभी कांटेक्ट ही नहीं किया ना कभी अपना नंबर दिया। मैं इंतज़ार करता रहा फिर जब मेरी यहाँ पोस्टिंग हुई तो यहाँ आ गया।मेरे लहज़े में अब गुस्सा और शिकायत थी।

'अच्छा, मैं भी दिल्ली में ही हु' उसने दबी आवाज़ में कहा।

'क्या करू मैं, अब इस इनफार्मेशन का?' मैंने झल्ला के कहा।

'साहिल, मेरे पास तब कोई मोबाइल नहीं था, तुमने मुझे अपना विजिटिंग कार्ड, तुम्हारी पहनाई हुई जैकेट में रख दिया था और मैं भूल गयी। मेरे पैर में फ्रैक्चर हो गया था  उस पर पलास्टर चढ़ा और उसके ठीक होने में 3 महीने लग गये थे। ठीक होने के बाद तुमसे मिलने के लिए मैंने कई बार शामे बस में सफ़र किया पर तुम नहीं मिले। इस दौरान मैंने जॉब के लिए अप्लाई करना शुरू कर दिया था, और दिल्ली से कॉल लेटर आ गया। दिल्ली आने के लिए जब सामान पैक करने लगी तो तुम्हारी जैकेट अपने सामान रखते हुए तुम्हारा विजिटिंग कार्ड मिला। दिल्ली में सेटल होकर, मैंने मोबाइल लिया है और तुम्हे कॉल किया' उसने बताया।

'अरे, तुम्हे मालूम नहीं था के मेरा नंबर उस जैकेट में है?' मैंने हैरत से मालूम किया।

'नहीं, धयान होता तो कहीं से भी, तभी कॉल नहीं कर देती!' उसने कहा।

'ओह! और मुझे लगा के तुम्हे मुझ से बात ही नहीं करनी है। अच्छा, तो अभी जैकेट वापिस करने को कॉल किया है?' मैंने मालूम किया।

'नहीं! वो तो मेरी हुई वो कभी वापिस नहीं करुँगी, उस दिन के लिए बस थैंक यू कहने को कॉल किया है …' उसने कहा।

'हाहाहा, अच्छा ठीक है रख लो जैकेट, पर कमाल है तुमने उसकी पैकेट, डेढ़ साल के बाद चेक की। वैसे, फिलहाल मैं भी दिल्ली में ही हु…' मैंने हसते हुए कहा।

'अरे, कमाल है!' उसने हैरत से कहा।

'तो मैं ये नंबर सेव कर लू या ये आखिरी कॉल आपने शुक्रिया कहने को किया है?' मैंने तन्ज़िया अंदाज़ में मालूम किया।

'जी बिलकुल सेव कर लीजिये और जब आप सेम सिटी में हैं तो, क्या आज हम कर्नाट प्लेस पर "सन राइज", कैफ़े में मिल सकते हैं?' उसने मालूम किया।

'जी ठीक शाम को 6 बजे मिलते हैं, बाकि की बाते मिलने पर, बाई!' मैंने कहकर कॉल कट कर दिया।

'मम्मी शाम को कोई ज़रूरी मीटिंग है मैं नहीं जा पाऊंगा, आप उन लोगो को मना कर दीजिये' मैंने किचेन में काम करती हुई माँ से कहा।

ज़िन्दगी अब नया मोड़ ले रही थी और मैं उसको वो मौका देना चाहता था।