सुबहः के सात बजे थे, फ्लाइट की सारी फॉर्मलिटीज पूरी हो गयीं थीं, तकरीबन अभी एक घंटा और इंतज़ार करना था। एयरपोर्ट के वेटिंग एरिया में दाख़िल हुआ और ख़ाली टेबल-चेयर तलाश करने लगा। सब जगह लोग ही लोग दिख रहे थे। बड़ी मुश्किल से एक टेबल नज़र आयी, जिस पर एक मोहतरमा देखीं- जीन्स एंड वाइट शर्ट पहने, सिर पर सनग्लासेस, कंधे तक कटे बाल और अपने मोबाइल में ग़ौर से कुछ पढ़ती हुई, उम्र लगभग 30 से ऊपर होगी।
'आप बुरा ना माने
तो क्या मैं आपकी ये टेबल शेयर कर सकता हु?' मैंने ज़रा हिचकिचाते हुए मालूम किया।
'जी ज़रूर' उन्होंने
मुस्कुराते हुए कहा और मुझे देखने लगीं।
'अज़ीम, नाम है मेरा' मैंने कहा।
मैंने अपना लैपटॉप बैग और फोल्ड किया हुआ न्यूज़ पेपर, जो मैं पढ़ रहा था, सामने की चेयर पर रख दिया।
‘मुझे नीलम कहते हैं’ उन्होंने प्यारी से आवाज़ में कहा।
'अज़ीम साहब, क्या आप कॉफ़ी लोगे? मैं अपने लिए
लेने जा रही हु…' उन्होंने उठते हुए बहुत अपनायत से पूछा।
'वो मैं…' अचानक पूछे गये
सवाल से मैं सकपका सा गया, समझ नहीं आया
क्या बोलू।
'अरे कोई बात नहीं, मुझे तो जाना ही था, बस चेयर नहीं
छोड़ पा रही थी। अब आप मेरी चेयर
एंड बैग का ध्यान रेखिये, मैं अभी आयी…' उन्होंने कहा और
चली गयीं।
कुछ ही पलों में वो दोनों हाथों में कॉफ़ी लेती हुई आयीं और
एक मेरे तरफ बढ़ा दी और मैंने झेपते हुए ले ली।
'मैं लेता आता, आपने ख़ामख़ा
तक़ल्लुफ़ किया' मैंने कॉफ़ी का
घुट लेते हुए कहा।
‘मैं कानपुर जा रही हु, फ्लाइट लेट हो
गयी है, चार घंटे और यहाँ
बीतने हैं' उन्होंने कॉफ़ी का
मग टेबल पर रखते हुए कहा।
'अच्छा, मैं पुणे जा रहा
हु। फ्लाइट एक घंटे
में है, एक मीटिंग अटेंड
करके रात तक वापसी है' मैंने अपने
प्रोग्राम के बारे में बताया।
'अच्छा, आप कॉर्पोरेट
एम्प्लोयी हैं?' उन्होंने मालूम
किया।
'जी, और आप? मैं तो आपके बारे
में अंदाज़ा ही नहीं लगा पा रहा' मैंने हसते हुए कहा।
'मैं एक राइटर और
सोशल वर्कर हु' उन्होंने सुकून
से जवाब दिया।
'ओह! सच में? आपको दिखकर ज़रा भी नहीं लगता ऐसा…' मैंने हैरान होते
हुए कहा।
'अरे इसमें हैरत
की क्या बात है, राइटर कैसे देखते
हैं और क्या मैं उन जैसी नहीं लगती?' उन्होंने हसते हुए कहा।
'वाकई, राइटर नाम से एक तस्वीर-सी ज़हन में आती है के कोई सादे से कपड़े पहने, कंधे पर थैला, आँखों पर काला मोटा चश्मा
होता होगा और कसम से आप बिलकुल ऐसी नहीं लगती…' मैंने कहा और
हम दोनों ठहाका लगा के हसने लगे।
कॉफ़ी का घुट लेते हुए हमारी एयरलाइन्स, राजनीति, मौसम, मूवी सब पर बात
हो गयी, बहुत ही
ज़िंदा-दिल और ख़ुश-मिजाज़ शख़्सियत लगीं मुझे। मैं उनके बारे में और जानना चाहता था
कहाँ से और कैसे शुरू करू समझ नहीं आ रहा था।
'नीलम जी, प्लीज बताये आप
किस टॉपिक्स पर लिखती है? ब्लॉग राइटर हैं
या आपकी कोई बुक पब्लिश हुई है?' मैंने मालूम किया।
'ये जो हाथ में
अख़बार पकड़ा था और उसमें एक आर्टिकल को आपने रेड पेन से सर्किल किया है, वो मेरा लिखा हुआ है'
उन्होंने बड़े सुकून
से मुस्कुराते हुए कहा।
'अरे!' मैं भोचक्का रह
गया और हैरत से अपनी दोनों हाथो से अपना सिर पकड़
लिया।
मेरी आदत थी के मैं हर न्यूज़ पेपर बहुत ग़ौर से पढता था और
जो दिलचस्प लगता उसको दोबारा पढ़ने के लिए किसी पेन से हाईलाइट कर देता, ताकि फुर्सत से बाद
में पढ़-समझ सकू।
'आप, नीलम आहूजा हैं?' मैंने फिर सवाल
किया।
'जी, अख़बार में लेख
लिखती हु और कुछ बुक्स भी छप चुकी हैं' उन्होंने सादगी से कहा।
अब मेरी फ्लाइट की बोर्डिंग का वक़्त हो गया था और अनोउसमेंट
होने लगी थी।
'नीलम जी, आपका ऑटोग्राफ
मिलेगा, आपको अंदाज़ा ही
नहीं के मैं आपके लिखे हुए हर आर्टिकल को कितने ग़ौर से और रेगुलर पढता हु…' मैंने बोर्डिंग
के लिए उठते हुए कहा।
'जी, मैंने आपके हाथ में पकड़े न्यूज़ पेपर के हाईलाइट आर्टिकल को से
अंदाज़ा लगा लिया था' उन्होंने
अपनी बैग से पेन निकला।
मैंने जल्दी से पैकेट से मोबाइल निकलकर
उनके साथ एक सेल्फी ले ली।
उन्होंने मुस्कुरा के बड़े से सुकून से पोज़ किया और मैंने उनकी तरफ अपना हाथ बड़ा दिया।
'आपका साइन, नीलम जी' मैंने कहा।
मेरी फ्लाइट की बोर्डिंग के लिए लगातार आवाज़ आ रही थी।
उन्होंने मेरी हाथ पर अपने पेन से साइन कर दिया।
मैंने जल्दी से अपना लैपटॉप बैग और फोल्ड किया हुआ न्यूज़
पेपर उठाया और चल दिया।
'नीलम जी, हम फिर मिलेंगे
और अगली कॉफ़ी मेरी तरफ से होगी, बाय!'
मैंने पलट कर
कहा।
'बाय' उन्होंने
मुस्कुराते हुए सर हिला दिया।
मैं बोर्डिंग के गेट की तरफ तेज़ी से चलने लगा और जिस हाथ
में उनका साइन था, वो मुठी बंदकर ली
जैसे इस खूबसूरत से अहसास को हाथ में थाम लेना चाहता था।
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