Sunday, 26 July 2026

लिखते हैं

कागज़ बन जाती है ज़िन्दगी, अपने लहू से कहानी कहते हैं,

हम वो जांबाज़ सिपाही हैं, जो शहादत पन्नो पर लिखते हैं।

 

अंधेरों में भटकते, कुछ साये रवां हैं वो हर पल साथ मेरे,

अपनी-अपनी जंग लड़कर, वो खुशियां और ग़म लिखते हैं।

 

लफ़्ज़ दे कर तस्वीर ख्वाब, ताबीर भी लिख देते हैं

कभी आस्मां की रंगीनियां, तो कभी धुँआ लिखते हैं।

 

कौन कहता है के मुमकिन नहीं कुछ हक़ीक़त हो जाना,

हम तो हर रोज़ आधे-अधूरे ख़्वाबों को सच लिखते हैं।

 

कुछ अजब रिश्ते यू हम फनकारों के हुआ करते हैं,

दर्द से जुड़कर, हम अपना खूबसूरत हुनर लिखते हैं।