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Wednesday, 28 October 2020

वो जो मसरुफ है इस क़दर

 


वो जो जज़्बातों को ना समझे, दिलों के इकरार ना माने,

मेरे हर इंतेज़ार से बेख़बर, वो जो मसरुफ है इस क़दर।


वो जो तोले दिमाग़ से ही, वो ना जाने हाल-ए-दिल मेरा कभी,

तवाज़ो को कर दे नज़रंदाज़, वो जो मसरुफ है इस क़दर।


वो मेरा आहटों पर चौकना, वो हर मोड़ पर मुड़ कर देखना,

उससे ही ढूँढे मेरी ये नज़र, वो जो मसरुफ है इस क़दर।


तन्हाईयाँ गूँजती है, इस ज़ेहन से अब उम्मीदें भी हुईं बेअसर, 

 दुश्मन-ए-जान बन गया ये सफ़र, वो जो मसरुफ है इस क़दर।


मैं मजबूर हूँ दिल से और उसकी ज़माने-भर की मजबूरियाँ,

मोहब्बत की वो जो ना करे क़दर, वो जो मसरुफ है इस क़दर।




Tuesday, 2 June 2020

अगली मुलाक़ात की बात की जाए



हर रोज़ की ख़बरें हैं किसी ना किसी के मर जाने की,
आओ तो अब, रोज़ की ज़िंदगी में, मौत की बात की जाए।


इतना क्या सोचना, मर जाएगे जब अपनी मौत आयेंगी तो,
ये जो ख़ौफ़ है मरने का उसपे, बेख़ौफ़ हो कर बात की जाए।


मायूस क्यू हो इस क़दर, क्यू डरते हो हमेशा बिछड़ जाने की सोच कर,
आओ मिलकर अब, अगली मुलाक़ात की बात की जाए।


होंगी बंदिशे और मसरूफ़ियात तुम्हें आज ज़मानेभर की,
आओ बैठ कर फ़ुरसत से आज, फ़ुरसत की बात की जाए।


दूरियों से धुधलें होने लगे वो तुमसे कुरबत के अहसास सभी,
मिलों कभी तो गले लगकर, ये सब अहसास फिर से जियें जाए।