Tuesday, 23 February 2016
Being Strong
Tuesday, 16 February 2016
Will you be mine
Till roses smell romantic and waves call for surfing?
Till sky fascinates all and clouds give hope for blessed raining?
Nature turned diverse with every passing second, without complaining,
Thursday, 28 January 2016
You are my Lifeline
©Iram Fatima ‘Ashi’
Imprint the
humble kisses of my exquisite lips, for your whole day shine,
Absorb the
warm hugs of my body in yours, to feel warmth like red wine.
My gentle smile to inspire you and to keep you beaming always and fine,
To brighten
your blissful day, I like to surrender this enlightened soul of mine.
Inhale the breaths of my life to make you more lively and feeling divine,
Our meeting
is like quenching of longing thirst, meet me lifelong on dine.
It’s a
heavenly feeling being with you, it gives sense to me, as you are my lifeline,
I accomplish
all my treasures being with you, as you are my delight and goldmine.
Love and
craving for boundless togetherness, takes us on cloud nine,
Let us
forget all worldly customs, beyond the border of acceptance or decline.
Monday, 11 January 2016
मैं ज़िंदा हुँ
करने
दो मुझे शोर के मैं ज़िंदा हुँ, पुकारू रोशनियाँ पिघलाने को अंधेरा कुछ और, के मैं
ज़िंदा हुँ।
मामूली
सही पर एक हसती है मेरी, कराने दो अपने वजूद का अहसास मुझे, के मैं ज़िंदा हुँ।
दुनियादारी
कब समझ आई है, जो अब समझ सकू, छोड़ दो मुझे मेरे हाल पर, के मैं ज़िंदा हुँ,
इन
दिखावे की महफ़िलो से दूर कहीं, रहने दो मुझे मेरी तन्हाइयों के साथ, के मैं ज़िंदा
हुँ।
घूँट-घूँट
बहुत पी लिया संजीदगी का ज़हर, मुझ को भी रहने दो लापरवाही, के मैं ज़िंदा हुँ,
पत्थर
बना दिया ख़ुद के अहसासों को ख़ुद में दफ़्न कर करके, ज़िदगी है बाकि अभी के मैं ज़िंदा
हुँ।
जिसे
किसी ने अपना बना कर छला हो, वो ग़ैरो से क्या कहे, आज करने दो गिला, के मैं ज़िंदा
हुँ,
मुझे
वक़्त ने मात दी, जो दौड़ा बेतहाशा, कह दो चले कभी मेरी चाल भी, के मैं ज़िंदा हुँ।
पेशानी
पर लिख दो, के ज़िंदा लोगों में है शुमारी मेरी, ख़ामोश रह कर कह ना सका, के मैं ज़िंदा
हुँ,
ज़र्रा-ज़र्रा
दर्द से चीख़ उठेगा ग़र कह दी दस्तान-ए-सफ़र मैंने, भीड़ के क़ब्रिस्तान मे सही, पर
मैं ज़िंदा हुँ।
Tuesday, 29 December 2015
मेरे बग़ैर?
मैंने पुकारा तुझे, तेरा नाम लिए बग़ैर, तू जो साँसों में रवाँ था मेरा साथ निभाए बग़ैर,
मेरा सब्र की इंतिहा देखिये, करती रही ज़िक्र तेरा सरे महफ़िल, तेरा नाम लिए बग़ैर।
तू जब साथ था तब भी साथी कहाँ था, तेरी हसरतें जहाँन भर की काफ़ी थी, मेरे बग़ैर,
मुझे ख़बर थी अंजाम-ए-मुहब्बत की, तंहा ही सफ़र गुज़रेगा ज़िंदगी का मेरी, तेरे बग़ैर।
मुस्कुराती रही ख़ामोशियो की ओढ़ कर चादर, किसी से भी शिकवे-शिकायतें, तेरी किए बग़ैर,
वो महमां है फिर लौट जाएगा अपनी मंज़िल, मैंने बेलौस मुहब्बत की, हिज्र की सोचे बग़ैर।
कोई इतना भी तंहा होता होगा कहीं, के धड़कने ख़ुद की सुन सके, कोई शोर हुए बग़ैर,
मुहब्बत है बेपनाह और दुआएँ बेअसर, विसाल-ए-यार हो कैसे, किसी मुअज्ज़े के बग़ैर।
सब कुछ पास होके भी एक ख़ालीपन हमसाया-सा है, हँसना सिख लिया, ख़ुश हुए बग़ैर,
हयात-ए-सफ़र मे छू कर बुलन्दियाँ, कभी तुझे भी खलती है कमी कोई, मेरे बग़ैर?
Monday, 21 December 2015
जज़्बातों की वसीहत
ख़ामोशी सी पसरी है, बेचैनियाँ और बेनूर सा है हर तरफ़ ही,
वो मसरूफ हैं इस क़दर, या के ये मौसम ही कुछ सर्द है।
ये बेताबियाँ है इस तरह, के दिल बेज़ार सा हुआ जाता है,
यू तो लबों पर मुस्कुराहट है मुसलसल लेकिन कहीं दर्द है।
हवाओं से कुछ कहते हुए डर है, कही राज़ ना हो जाए बेपरदा,
वो धूप सेकते होगे गरम सी, यहाँ तो तंहाईयो की ठंडी गर्द है।
कोई बताए के माजरा क्या है, मैं ख़ाली सा हुँ, या ये है सन्नाटा मुझ में ही,
कोई हादसा हुँ, या के किसी की बेवफ़ाई का आलम, अब मुझ में दर्ज है।
मालिकाना हक़ दे दिया, लिख दी अपने जज़्बातों की वसीहत उसके नाम,
ख़ाली हाथ वापसी होगी के साँसें साथ हैं छोड़ती, और जिस्म भी ज़र्द है।
Tuesday, 15 December 2015
मेरा हिस्सा
आज कुछ लम्हे उस पर ख़र्च कर आया, वो मेरा हिस्सा था कह दिया, हिसाब
आया अपनी ये ज़िंदगी।
कुछ जमाख़ोरी की मैंने ज़माने से छुप कर, दिल के तहख़ाने में दबाई थी
उस की तस्वीर और यादें,
आज उस से मिल कर सब जज़्बात बेपरदा कर दिए, कह आया हाल-ए-दिल और दिल
की लगी।
बचपन बेपरवाही में गुज़रा, जवानी जम्मेदारियो की नज़र होकर रह गई, हशीये पर रहे जज़्बात मेरे,
ख़ुदा मेरे आसपास ख़फा-सा रहा मुझ से और मै बुतग़ाहो में तलाश
करके करता रहा बंदगी।
तशनगी ने उसकी कभी सूकून ना लेने दिया, बेचैनियों में कटा तो कभी तलब
में उसकी, ये सफ़र,
वो जो मेरा था, मेरे लिए रहा बेताब उम्र भर, और मै ग़ैरों में तसकीम करता रहा उसकी
हिस्सेदारी।
हसरत सी रह जाती अधुरी ख़ुद के लिए जीने की, ग़र ना जाता मिलकर उससे,
ख़ुद को मुक्कमल करने,
वो ज़िद्दी।
बेतरतीबी से टुकड़ों में बिखरा सा वजूद मेरा, तमाशाई-सा लगता है ये बनावटी
ये सारा जहाँ,




